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2 अप्रैल 2011, सायं 7 बजे, कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन।

प्लेटफॉर्म पर असामान्य हलचल थी।
चारों ओर एक ही शोर गूँज रहा था — क्रिकेट कमेंट्री का। लोग रेडियो से चिपके हुए थे, मानो पूरा देश उसी क्षण में ठहर गया हो। ट्रेन की घोषणाएँ उस शोर में कहीं दब-सी गई थीं।

मैं भी क्रिकेट का प्रबल प्रेमी था, पर उस दिन…
न जाने क्यों, उस शोर से मेरा मन कट गया था।

मेरे भीतर कुछ और ही चल रहा था।

एक अनाम-सी व्याकुलता,
एक अजीब-सी आशंका।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं किसी घने जंगल में भाग रहा हूँ —
पीछे कुछ अनदेखे जीव मेरा पीछा कर रहे हों, और मैं थककर चूर हो चुका हूँ, फिर भी रुकने का साहस नहीं कर पा रहा।

शरीर विश्राम चाहता था,
मन ठहर जाना चाहता था,
परंतु परिस्थितियों ने जैसे मुझे आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर दिया था।

मैंने स्वयं को सँभाला, और भारी कदमों से चौरी-चौरा एक्सप्रेस के अपने कोच की ओर बढ़ गया।

डिब्बे में प्रवेश करते ही एक शीतल, कृत्रिम निस्तब्धता ने मुझे घेर लिया।
यह तीसरे वातानुकूलित श्रेणी का डिब्बा था — व्यवस्थित, शांत, और बाहरी कोलाहल से पूर्णतः अलग।

मैं अपनी सीट पर आकर बैठ गया।

परंतु मन की अशांति वैसी ही बनी रही।

तभी मेरी दृष्टि अनायास ही सामने की सीट पर जाकर ठहर गई…

------------------------------------------conjuction-------------------------------------------------------।


उसकी मुस्कान जैसे ठंडी हवा में भी गर्माहट घोल रही थी। ट्रेन की खिड़की से आती हवा उसके बालों को बार-बार चेहरे पर बिखेर देती, और वह उन्हें बड़ी सहजता से कानों के पीछे सरका लेती।
नीली आँखें… गहरी और आकर्षक, जिनमें एक अनकहा रहस्य छिपा था।
उसकी सादगी में भी एक अलग ही जादू था।
ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वर्ग से कोई परी धरती पर उतर आई हो,
और मैं अनायास ही उसकी छवि में खोकर कल्पनाओं के सागर में डूबता चला गया। 

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से सरकने लगी।
प्लेटफॉर्म का दृश्य पीछे छूटता गया, और भीतर एक गहरी निस्तब्धता फैल गई ।

कुछ देर तक हम दोनों के बीच मौन का एक अदृश्य परदा तना रहा।
मैं उसे चोर नज़रों से चुपके-चुपके देखता रहा।
शायद उसे इसका आभास हो गया था।

तभी वह अचानक बोली—
“गौतम आउट हो गया…”

मैं थोड़ी देर के लिए चौंक गया।
“क्या?” मैंने अनजाने में पूछ लिया।

वह हल्के से हँसी—
“आप सुन नहीं रहे थे क्या?

मैंने आसपास देखा। कहीं दूर किसी के मोबाइल से धीमी-सी कमेंट्री की आवाज़ आ रही थी।

“नहीं… मेरा ध्यान कहीं और था,” मैंने संकोच से कहा।

“पता है,” उसने मेरी ओर देखते हुए जवाब दिया।

उस एक वाक्य ने जैसे मेरे भीतर हलचल मचा दी।
क्या वह समझ गई थी कि मैं उसे ही देख रहा था?

मैंने नज़रें झुका लीं।
पर अब मौन पहले जैसा सहज नहीं था - उसमें एक अनकही शांति के साथ हल्की-सी झिझक भी घुल गई थी।

“क्रिकेट पसंद है आपको?” उसने बात को सहज बनाते हुए पूछा।

“बहुत… पर आज मन कहीं और उलझा हुआ है,” मैंने धीमे स्वर में कहा।

“कभी-कभी ऐसा होता है,” 

उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा,
“जब कोई नया दृश्य, किसी पुराने शौक से भी ज्यादा दिलचस्प लगने लगे।”

मैंने उसकी ओर देखा।

वह अब भी बाहर देख रही थी—
पर उसके शब्द जैसे सीधे मेरी ओर ही आए थे।

ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी।
और मुझे पहली बार एहसास हुआ—

यह सफ़र सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाने का नहीं है…
कुछ और भी है, जो धीरे-धीरे शुरू हो चुका है।

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