एक व्यक्ति की सोच, उसका मस्तिष्क उसी तक सीमित होता है। वह संसार के समस्त प्राणियों, जनजातियों को नैतिक मूल्यों के आधार पर नहीं देखता, फिर चाहे वह बड़ा वैज्ञानिक हो या श्रेष्ठ शिक्षित नागरिक। कभी—कभी लाखों में यदि कोई ऐसा व्यक्ति निकल आए, तो वह महान व्यक्ति कहलाता है, और समाज में वर्षों तक उसे पूजनीय माना जाता है। उसके दिल में प्रकृति के समस्त प्राणियों के प्रति करुणा एवं आदर का भाव होता है। किंतु हमारे लिए केवल मानव ही सम्मान के योग्य हैं; बाकी पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब हमारे स्वार्थ और इच्छाओं की पूर्ति का एक स्रोत मात्र हैं। तभी तो हम अपने लिए उत्तम-से-उत्तम संविधान बनाते हैं। यदि किसी का कत्ल हो जाए तो मुकदमा लगेगा, कारावास होगा; वहीं मुर्गे, बकरे, पेड़-पौधे काटे जाएँ तो वह सामान्य बात मानी जाती है।
आप विज्ञान की दृष्टि से देखेंगे और सही से समझेंगे, तो आपको पता चल जाएगा कि मानव, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे — इनके शरीर की सिर्फ़ बनावट अलग होती है; तत्व वही होते हैं। और उन सब में आत्मा, एक दैवीय शक्ति, ईश्वर — जो भी कह लीजिए — यदि यह शरीर से निकल जाए तो वह किसी काम का नहीं रहता, फिर वह चाहे इंसान हो या जानवर। इन बातों से यह सिद्ध होता है कि इंसान और जानवर में कोई अंतर नहीं है, सिर्फ विवेक और आकार के। इसका मतलब हम जानवरों को इसलिए मारकर खा जाते हैं क्योकि वे हमसे छोटे हैं, विवेकहीन हैं, हमारी बुद्धि के गुलाम हैं, बेबस हैं, लाचार हैं; हम तो उनकी इसी बेबसी और लाचारी का फायदा उठा रहे हैं।
एज़ाज मुझसे दस साल बड़ा था, पर विचार मिलते थे, इसलिए हम दोनों में गहरी मित्रता थी। अब दोस्ती अच्छी थी, तो हम दोनों के बीच अक्सर घंटों पसंद, नापसंद, राजनीती, समाज पर चर्चाएँ होती रहती थीं। एजाज़ शाकाहारी था, शुरू से नहीं — छह साल की उम्र से उसने माँसाहार छोड़ दिया था। जब उसने मुझे यह बताया था तो बड़ा विचित्र लगा। एक व्यक्ति जो समाज के ऐसे वर्ग से आता हो जहाँ माँसाहार ही सब कुछ है और वो शाकाहारी होने की बात कर रहा हो, थोड़ा विचित्र तो लगता है। ऐसा भी नहीं कि उसे माँस अच्छा न लगता था, फिर ऐसा क्या कारण था जो उसने शाकाहारी होना पसंद किया?
एजाज़ इस बारे में बताते हुए कहता है —
“मैं माँस खाने का बहुत ही शौक था, हमारे यहाँ हफ्ते में कम से कम एक बार तो मुर्गा या मछली बनती ही थी।”
एजाज़ आगे कहता है —
“ज़िंदगी में जब अपने लोग (जिनसे आपको प्रेम हो) बिछड़ जाते हैं, तब बेइंतहा दर्द महसूस होता है। दूसरों के यहाँ जवान मौत हो जाए तो हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तीसरी कक्षा में जब मैं था, उस वक्त हमारे यहाँ बकरी ने एक बच्चे को जन्म दिया था — बड़ा प्यारा था। मैं उसके साथ अक्सर खेलता था, खाना खिलाता, चराने ले जाता। वो मुझसे पग गया था, हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी। वो मेरे बगल में ही बिस्तर पर सोता था।
हर कोई एक न एक दिन बिछड़ ही जाता है, पर कुछ ऐसे होते हैं जिनके बिछड़ने का आपको जीवनभर मलाल रहता है और आपके जीवन में काफी कुछ बदल जाता है। बकरा छह महीने में बड़ा हो गया था; त्योहार करीब था—मतलब साफ़ था कि उसके जीवन की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। इस बात का मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था; उतनी समझ नहीं थी।
आख़िर वह पर्व आ गया। मैंने पहले भी बकरे-मुर्गे काटते हुए देखे थे, और उस दिन भी बेताब था; पर जब मेरे बकरे को लाया गया तो मैं रोना-धोना शुरू कर दिया।
आप जिससे मोहब्बत करते हों, उसे आपके सामने काट दिया जाए तो क्या होगा?
छोटे बच्चों को खिलौनों से, जानवरों के बच्चों से लगाव होता है—वे उन्हें खोना नहीं चाहते।
आख़िर उसे काट दिया गया। मेरी नज़रों के सामने मैंने अपने अज़ीज़, जो मुझे पहचानता था, समझता था, दुलार करता था—उसे खो दिया।
और हद तो तब हो गई जब उसका माँस मेरी थाली में था...... मैं रोता रहा; थाली लेकर बाहर गया, गड्ढा खोदा और उसे दफना दिया। ये सब मेरे अब्बा-अम्मी देख रहे थे।
वह दिन था जिसके बाद मेरे घर में किसी ने माँस नहीं खाया।”
एज़ाज भावुक था; उसकी आँखों से करुणा के भाव बह रहे थे।
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